लखनऊ की यात्रा में मिला ‘मित्र-पत्र’, खपड़ों में उलझी एक दिलचस्प कहानी

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लखनऊ की यात्रा में मिला ‘मित्र-पत्र’

सुबह घर से अकेला निकला। चौराहे पर पहुँचा तो सुबह वाले मित्र-पत्र से मुलाकात हो गई। कुछ देर बातचीत करने के बाद इंटरसिटी बस आ गई।

बस पर चढ़ते ही सामने लिखा था—“आपकी यात्रा मंगलमय हो।”

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पढ़कर मन गदगद हो गया। दूसरे यात्रियों की तरह मैं भी एक सीट पर बैठ गया। मेरे अगल-बगल बूढ़े, जवान और किशोर यात्री बैठे थे। किसी के हाथ में एक खपड़ा था तो किसी के हाथ में दो-दो खपड़े। कान में ढक्कन लगाए सभी मुस्कुरा रहे थे।

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मुझे लगा, शायद मैं गलती से किसी एलियन के उड़नखटोले पर बैठ गया हूँ!

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बस में हर हाथ में था ‘खपड़ा’

मैंने बस में नजर दौड़ाई तो देखा कि आधी बस खाली थी। ड्राइवर गाने की धुन पर बस को दौड़ाए जा रहा था। लेकिन उसके मन में एक चिंता जरूर कचोट रही होगी—आधी बस खाली है, बस मालिक की जेब कैसे मंगलमय होगी!

मैंने अपने मित्र-पत्र के साथ समाज के विभिन्न बिंदुओं पर नजर दौड़ाना शुरू किया।

देखा तो कहीं बारिश में मकान बह गए थे। कई जिलों में अगले 24 घंटे बारिश का अलर्ट घोषित था। मन में खयाल आया—मेरे यहाँ तो पका बेल हाथ से गिर जाए तो वह भी फूट जाएगा!

वैसे यह भी प्रकृति की माया है—कहीं धूप, कहीं छाया।

आगे देखा तो साइबर फ्रॉड में कई नौजवान धराए गए थे। लग रहा था कि कोरोना के बाद अब यही सबसे बड़ी सामाजिक बीमारी पनप रही है।

उसके आगे देखा तो ई-20 को लेकर पेट्रोल पंप और सड़क पर नौजवानों का 20-20 हो रहा था।

खैर, मैं ऊब गया और अपना मित्र-पत्र बगल में बैठे यात्री को थमा दिया। वह बेचारा उसे छूना भी नहीं चाहता था, लेकिन मेरे कहने पर ले लिया।

वैसे जब मैं खुद नजरें दौड़ा रहा था, तब भी वह उसे तिरछी नजरों से देखने की कोशिश नहीं कर रहा था। इससे मैं समझ गया कि इसमें उसकी कोई रुचि नहीं है।

पाँच मिनट कुछ देखने के बाद उसने मुझे वापस कर दिया।

फिर मैंने आसपास के दूसरे यात्रियों को देने की कोशिश की, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। सब अपने-अपने कान में बटन लगाए मुस्कुरा रहे थे।

मुझे थोड़ी झेंप महसूस हुई कि बिना माँगे मैं अपना मित्र दूसरों के गले डालने लगा था।

आज के किशोर, नौजवान, अधेड़ और बूढ़े—सबकी रुचि अब इसमें कम होती जा रही है।

लोग अब नजरें दौड़ाना चाहते हैं, दिमाग नहीं।

मैं यही सोच रहा था कि बारिश होने लगी।

बारिश, खुली खिड़की और मलयाचल की हवा

प्रकृति की मनमोहक छटा देखकर मन आनंदित हो उठा। मैंने झट से खिड़की का शीशा खोल दिया और मलयाचल की सुगंधित हवाओं का आनंद लेने लगा।

कपड़े तो भीग गए, लेकिन गर्मी से राहत मिल गई।

आगे स्टाफ पर बस रुकी। दो पैसेंजर और सवार हुए। उनमें से एक बस मालिक थे। कुछ देर केबिन में बैठकर ड्राइवर और खलासी से बातचीत की और बोले—

“रोज गाड़ी का नंबर कैंसिल नहीं करेंगे।”

फिर खुद स्टेयरिंग पर बैठकर बस हाँकने लगे और बोले—

“ऐसे चलाओ तो पैसेंजर मिलेंगे।”

दूसरे यात्री मेरे बगल में बैठ गए। संक्षिप्त परिचय हुआ तो पता चला कि वह बस्ती के रहने वाले हैं। मेरे पड़ोस के गाँव में उनकी रिश्तेदारी भी थी।

बड़ी आत्मीयता से सज्जन बातें करते रहे। तब मुझे लगा कि मैं अपने ही समाज के बीच बैठा हूँ।

उनसे बातें करते-करते मैं लखनऊ कब पहुँच गया, मुझे पता ही नहीं चला।

लखनऊ पहुँचते ही बदल गई यात्रा

तभी बस वाले ने कहा—

“आप लोग यहीं उतर जाइए। आगे मैं नहीं जाऊँगा। चेकिंग लगी है।”

सभी यात्री उतरने लगे।

एक यात्री ने सवाल दागना शुरू कर दिया—

“प्राइवेट बस वालों का यही हाल होता है। गंतव्य तक नहीं पहुँचाओगे, किराया पूरा लोगे। टैक्सी का भाड़ा कौन देगा? दस रुपये कम रहते तो नहीं लेते!”

खलासी ने समझाते हुए कहा—

“भाई, आज की बात है। रोज तो आपको कमता तक ले जाते हैं। आज मजबूरी है।”

खैर, धीरे-धीरे सभी यात्री बस से उतर गए। मैं भी नीचे उतर आया।

मेरे लिए जगह बिल्कुल अनजान थी।

किधर जाना है? कौन-सा टेंपो पकड़ना है? मुझे कुछ मालूम नहीं था।

कई टेंपो वालों को हाथ दिया, लेकिन कोई नहीं रुका।

‘कचरा’ सुनकर मित्र-पत्र को आया गुस्सा

फिर कुछ दूर पैदल चलने के बाद एक लड़के से पूछा—

“बेटा, कमता जाना है। वहाँ से लूलू मॉल जाना है। टेंपो कहाँ मिलेगी?”

उसने बताया—

“टेंपो यहीं मिलेगी। हाथ में कचरा लेकर ऐसे रोकोगे तो कोई नहीं रुकेगा।”

‘कचरा’ सुनकर मेरे मन को झन्नाटेदार तमाचा लगा।

लेकिन अजनबी आदमी था, इसलिए चुप रहा।

हाँ, मेरे साथ मौजूद मित्र-पत्र से मिली ऊर्जा ने मेरे मुँह से अनायास कुछ शब्द निकलवा ही दिए।

मैंने कहा—

“बेटा, मेरी जन्मस्थली गोरखपुर है। मेरा जन्म रात में होता है। सुबह मैं बिना बोले लोगों को दुनिया भर की जानकारी देता हूँ। मेरे अंदर जो लिखा जाता है, वह इतिहास के पन्नों में दर्ज होता है। शासन और प्रशासन की नजरें मुझ पर पड़ती हैं। मुझे दस्तावेज के रूप में रखा जाता है। लोग अपना नाम छपवाने के लिए तरसते हैं।

यह बात अलग है कि दूसरे दिन मैं बासी हो जाता हूँ और रद्दी में फेंक दिया जाता हूँ। मेरा नाम ‘पत्र’ है और जो मेरे साथ है, वह ‘पत्रकार’ है। दोनों की बड़ी मेहनत होती है। तब मैं सुबह आमजन को ज्ञानवर्धक सूचनाएँ देता हूँ।”

मित्र-पत्र ने बताई पढ़ने की अहमियत

फिर मैंने उस लड़के से कहा—

“बेटा, बस की यात्रा से मुझे पता चला कि अब लोगों में पढ़ने की आदत कम हो रही है।”

फिर मैंने उसे समझाते हुए कहा—

“बेटा, मोबाइल देखना बुरा नहीं है, लेकिन किताब और अखबार पढ़ने की आदत छोड़ देना ठीक नहीं। किताब पढ़ते समय दिमाग खुद सोचता है, सवाल करता है और कल्पना करता है। रील और छोटे वीडियो बस देखते चले जाने की आदत डाल सकते हैं। इसलिए मोबाइल भी देखो, लेकिन अपने दिमाग की कसरत के लिए किताब और अखबार से दोस्ती बनाए रखो।”

इतने में एक टेंपो वाला हार्न बजाता हुआ सामने से निकला।

लड़का झट उसके सामने खड़ा हो गया और टेंपो रोककर बोला—

“कमता छोड़ देना।”

मैंने राहत की साँस ली और लड़के से कहा—

“धन्यवाद!”

वह मुस्कुराया और बोला—

“आपकी यात्रा मंगलमय हो।”

मैं मुस्कुराते हुए टेंपो में बैठ गया।

एक यात्रा, एक मित्र और एक संदेश

मन में खयाल आया—

सुबह बस पर लिखा था—‘आपकी यात्रा मंगलमय हो।’

और अब एक अनजान लड़के ने भी वही कहा—

“आपकी यात्रा मंगलमय हो।”

शायद यह सिर्फ यात्रा नहीं थी।

यह मित्र-पत्र से खपड़े तक और फिर खपड़े से वापस पढ़ने की यात्रा भी थी।

— डॉ. निसार अहमद खान

डॉ. निसार अहमद खां

एम.ए., एम.जे.एम.सी., पीएच.डी. पत्रकारिता के क्षेत्र में दो दशक से अधिक समय से सक्रिय। समाचार संकलन, लेखन एवं संपादन के साथ शिक्षा, राजनीति और ग्रामीण पत्रकारिता पर विशेष रिपोर्टिंग का अनुभव। News Universal Hindi के संस्थापक, प्रकाशक एवं संपादक।

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